बसंत पंचमी : प्रकृति से जुड़ने की एक मानवीय पुकार

 






बसंत पंचमी आते ही प्रकृति मानो हमसे बात करने लगती है। सर्दी की जकड़न ढीली पड़ जाती है, पेड़ों पर नई कोपलें मुस्कुराने लगती हैं और खेतों में सरसों पीली चादर ओढ़ लेती है। यह केवल मौसम का बदलना नहीं है, यह जीवन के फिर से खिलने का संकेत है। लेकिन सवाल यह है—क्या हम इस खिलते जीवन की कद्र कर पा रहे हैं?

आज का सामान्य जीवन देखिए। सुबह हम उठते हैं, नल खोलते हैं और यह सोचे बिना पानी बहा देते हैं कि यही पानी कभी नदियों में जीवन देता था। सड़क पर चलते समय खाली बोतल या पॉलिथीन यूँ ही फेंक देते हैं, यह जाने बिना कि यही कचरा किसी नाली को जाम करेगा, किसी गाय का जीवन खतरे में डालेगा या किसी बच्चे को बीमार करेगा। ये छोटी-छोटी आदतें हमें सामान्य लगती हैं, लेकिन प्रकृति के लिए यही सबसे बड़ी चोट हैं।

बसंत पंचमी ज्ञान की देवी माँ सरस्वती की आराधना का पर्व है। पर क्या ज्ञान केवल किताबों तक सीमित है? अगर हम पढ़े-लिखे होकर भी पेड़ काटने पर चुप रहें, नदियों के गंदे होने पर अनदेखा करें और प्रदूषित हवा में साँस लेते हुए भी सचेत न हों—तो ऐसा ज्ञान किस काम का? सच्चा ज्ञान वही है जो हमें जिम्मेदार नागरिक और संवेदनशील इंसान बनाए।

ग्रामीण जीवन में पहले हर घर के आँगन में तुलसी, नीम या अमरूद का पेड़ होता था। बच्चे उन्हीं पेड़ों के नीचे खेलते-बढ़ते थे। आज शहरों में फ्लैट तो ऊँचे हो गए, पर आँगन गायब हो गए। मोबाइल स्क्रीन तो चमक रही है, लेकिन बच्चों ने असली बसंत कम देखा है। यही कारण है कि आज एलर्जी, अस्थमा और तनाव जैसी समस्याएँ सामान्य होती जा रही हैं।

इस बसंत पंचमी पर हमें बड़े-बड़े भाषणों से नहीं, बल्कि छोटे-छोटे संकल्पों से शुरुआत करनी होगी। अगर हर परिवार साल में सिर्फ एक पौधा लगाए और उसे पेड़ बनने तक जिम्मेदारी से संभाले, तो शहर फिर से हरे हो सकते हैं। अगर हम शादी-ब्याह और त्योहारों में अनावश्यक प्लास्टिक का उपयोग कम कर दें, तो नदियाँ और नाले सांस ले सकेंगे। अगर हम बच्चों को यह सिखाएँ कि पेड़ दोस्त होते हैं, बोझ नहीं—तो आने वाला कल सुरक्षित होगा।

बसंत का संदेश साफ है—प्रकृति हमें हर साल नया अवसर देती है, पर वह असीम सहनशील नहीं है। अब समय है कि हम केवल उपभोक्ता नहीं, बल्कि संरक्षक बनें।

आइए, इस बसंत पंचमी पर माँ सरस्वती से यह प्रार्थना करें कि हमें ऐसा ज्ञान मिले जो हमें प्रकृति से जोड़ दे, ऐसा विवेक मिले जो हमें जिम्मेदार इंसान बना दे, और ऐसा साहस मिले कि हम पर्यावरण के लिए सही कदम उठा सकें।

क्योंकि बसंत तभी सुंदर है, जब धरती हरी है।
प्रकृति बचेगी, तभी भविष्य बचेगा। 🌼🌱
लेखक महेश तिवारी प्रकृतिप्रेमी, साईकलिस्ट, वक्ता एवं 
स्वच्छ भारत अभियान ब्रांड एम्बेसडर सागर💚🌴🚲🚲🇮🇳

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